क्या महिलाएं वाक़ई 498ए को ‘क़ानूनी टेरर’ की तरह इस्तेमाल करती हैं?

Hindi New Delhi

DMT : नई दिल्ली : (02 सितंबर 2023) : –

पिछले कुछ महीनों में कम से कम सात ऐसे मामले आए हैं जिसमें कई हाई कोर्टों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के दुरुपयोग पर अफसोस जताया.

ये क़ानून विवाहित महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए बनाया गया है.

इन अदालती टिप्पणियों पर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आई हैं.

एक तरफ़ कई ‘पुरुष अधिकार’ समूहों ने इन टिप्पणियों को क़ानून के दुरुपयोग की ज़मीनी हकीक़त की स्वीकार्यता बताया है.

दूसरी तरफ़ महिला वकीलों और कार्यकर्ताओं ने अदालत द्वारा इस तरह की भाषा इस्तेमाल करने पर अफसोस जताया है.

हालांकि अदालत ने कहा कि ये मामला पति के परिवार के ख़िलाफ़ बदला लेने के लिए लाया गया है क्योंकि शारीरिक हिंसा और दहेज की मांग को लेकर पत्नी के बयान में विसंगतियां हैं.

इसके अलावा सास ससुर इस दंपति के साथ बहुत कम समय के लिए रुके. कोर्ट ने सास ससुर के ख़िलाफ़ मामले को ख़ारिज कर दिया हालांकि पति के ख़िलाफ़ मामला जारी रहा.

भारतीय दंड संहिता में धारा 498ए को 1983 में शामिल किया गया जब पत्नी के ख़िलाफ़ क्रूरता और दहेज से जुड़ी कई मौतों के मामले सामने आए.

इस कानून के अनुसार, अगर कोई पति या उसके रिश्तेदार, पत्नी को उत्पीड़न का निशाना बनाते हैं तो उन्हें तीन साल की सज़ा हो सकती है.

ये धारा संज्ञेय और गैरज़मानती है, यानी, इसमें ज़मानत नहीं मिलेगी और पुलिस बिना वारंट के भी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर सकती है.

यह क़ानून सिर्फ दहेज से जुड़े मामलों में ही सुरक्षा प्रदान नहीं करता, बल्कि क्रूरता से भी बचाव करता है.

क्रूरता से मतलब है- दहेज के लिए परेशान करना या कोई भी ऐसा बर्ताव करना जिससे महिला को मानसिक या शारीरिक क्षति पहुंची हो या इसकी वजह से आत्महत्या को मजबूर हुई हो.

पिछले कई सालों में अदालतों ने इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कई निर्देश दिए हैं.

साल 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दाम्पत्य या पारिवारिक विवाद में कोई भी एफ़आईआर दर्ज करने से पहले, पुलिस को प्राथमिक जांच पड़ताल करनी चाहिए.

साल 2014 में, धारा 498ए के तहत गिरफ़्तारी का एक मामला आया.

क्या क़ानून का दुरुपयोग हो रहा है?

इस क़ानून के दुरुपयोग को लेकर हाई कोर्ट की टिप्पणी का ‘पुरुष अधिकार’ समूहों ने समर्थन किया है.

एक एनजीओ ‘मेन्स वेलफ़ेयर ट्रस्ट’ के अध्यक्ष अमित लखानी ने कहा, “सिर्फ एक बयान पर, पतियों और उनके परिवारों को जेल में ठूंस दिया जाता है, उनका करियर, आत्म विश्वास और जीवन यापन सब कुछ छिन जाता है.”

उन्होंने कहा कि इनमें से कई लोग सालों बाद बरी हुए हैं, जोकि इंसाफ़ की कमी को ही दर्शाता है.

उनके अनुसार, ‘जेंडर न्यूट्रल क़ानूनों’ की सख़्त ज़रूरत है.

‘अखिल भारतीय पत्नी अत्याचार विरोधी संघ’ के अध्यक्ष दशरथ देवड़ा के अनुसार, “क़ानून अपनी जगह सही है लेकिन जिसका हम विरोध कर रहे हैं वो है ग़लत आरोप लगाना.”

वो आगे जोड़ते हैं कि कुछ मामलों में हो सकता है कि पति, पत्नी को परेशान कर रहा हो लेकिन ‘पूरे परिवार के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करना ग़लत’ है.

धारा 498 ए के दुरुपयोग को लेकर जो प्रमुख तर्क दिये जा रहे हैं वे हैं- इन मामलों में सज़ा की बहुत कम दर का होना.

सज़ा की दर का हवाला देते हुए कई पुरुष अधिकार कार्यकर्ता दावा करते हैं कि ‘498ए के तहत दायर अधिकांश मामले झूठे हैं.’

हालांकि कई वकीलों और फ़ील्ड में शोध करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि इस धारा का दुरुपयोग नहीं हो रहा है, बल्कि सज़ा की दर ज़मीनी हकीक़त की एक ग़लत तस्वीर पेश करती है.

दिल्ली की क्रिमिनल लॉयर अपर्णा भट कहती हैं, “दुरुपयोग की बात से मैं सहमत नहीं हूं. असल में धारा 498ए के तहत मुकदमा काफ़ी मुश्किल है.”महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा पर काफ़ी काम कर चुके और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के रिसोर्स सेंटर फ़ॉर इंटरवेंशन ऑन वॉयलेंस अगेंस्ट वुमेन (आरसीआई-वीएडब्ल्यू) के संयोजक बलवंत सिंह धारा 498ए मामलों में दुरुपयोग की बात से सहमत नहीं हैं.

ये मामले अदालत में पहुंचने से पहले बंद हो गए और पुलिस ने इन्हें ‘झूठे’ और ‘ग़लतफ़हमी’ का नतीजा क़रार देते हुए इन्हें बंद कर दिया.

बलवंत सिंह कहते हैं, “अध्ययन में पता चला कि जो अधिकांश केस बंद कर दिए गए थे, उनमें महिलाओं को अपने पतियों और ससुराल पक्ष की ओर से हिंसा का सामना करना पड़ा था.”

उनके अनुसार, “498ए का बहुत दुरुपयोग हो रहा है ऐसी धारणा सभी पक्षों के पितृसत्तात्मक सोच के कारण बनी. पुलिस इन मामलों को निजी विवाद की तरह मानती है जिन्हें सुलझाया जाना चाहिए.”

कई मामलों में शारीरिक उत्पीड़न के स्पष्ट संकेत के बाद ही पुलिस शिकायत दर्ज करती है.

बलवंत सिंह कहते हैं, “पुलिस मामले दर्ज करने की अनिच्छुक होती है. कई मामलों में महिलाओं को केस दर्ज कराने के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना पड़ा.”

अपर्णा भट कहती हैं कि ‘अगर एफ़आईआर दर्ज भी हो जाती है तो महिलाओं पर सुलह का भारी दबाव होता है, उनके परिवार, पुलिस और यहां तक कि जजों की तरफ़ से भी.’

उनके मुताबिक, “परिवार समझौते के लिए बच्चों की कस्टडी को हथियार बनाता है जिससे महिलाओं पर सुलह का दबाव बढ़ता है.”

बलवंत सिंह ने कहा कि रिश्तेदारों के दबाव में या तलाक़ के लिए पति के राज़ी हो जाने या महिला को उसके मायके भेजने की बात मानने की वजह से अक्सर महिलाएं अपने केस को आगे बढ़ा पाने में खुद को असहाय पाती हैं.

अगर मामला आगे बढ़ता भी है तो हिंसा को सिद्ध करना बहुत मुश्किल होता है.

अपर्णा भट के मुताबिक, “कई तरह की हिंसा होती है, शारीरिक, मानसिक और आर्थिक. इनमें से अधिकांश को लेकर कोई चिकित्सकीय सबूत नहीं होता.”

कई मामलों में महिलाओं को केस दर्ज होने से पहले लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ता है और तबतक सबूत इकट्ठा करने में काफ़ी समय बर्बाद हो चुका होता है.

बलवंत सिंह कहते हैं कि उत्पीड़न बंद दरवाजे के भीतर होता है, इसलिए सबूत पेश करना बहुत मुश्किल होता है और मामला लंबे समय तक खिंचता है, इसलिए सज़ा में भी मुश्किल होती है.

जहां तक क़ानून के दुरुपयोग की बात है, अधिकांश एक्सपर्ट का मानना है कि ये किसी भी क़ानून के साथ संभव है, हालांकि 498ए के दुरुपयोग का मामला सुर्खियों में आया क्योंकि ये महिलाओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है.

गुजरात के पूर्व एडीजी डॉ. रंजन प्रियदर्शी कहते हैं, “महिलाओं के लिए 498ए बहुत क्रांतिकारी क़ानून है. महिलाओं के ख़िलाफ़ उत्पीड़न रोकने में इसने बहुत अहम भूमिका निभाई है.”

वो कहते हैं, “दुरुपयोग तो किसी भी क़ानून का हो सकता है.”

बलवंत सिंह के अनुसार, ‘झूठे’ या ‘ग़लतफहमी’ को आधार बनाकर बंद किए गए मामलों में पति या उनके परिवारों की ओर से हिंसा हुई थी.

हालांकि उन्हें वकीलों ने बताया था कि धारा 498ए को लागू करने के लिए उन्हें दहेज का आरोप इसमें जुड़वाना होगा, जबकि इस क़ानून में इस तरह की कोई ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने कहा, “इस तरह, केस दर्ज कराने के लिए उन मामलों में भी दहेज के दावों को बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है जिनमें ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं होती है. बाद में ये मामले खारिज हो जाते हैं. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि मामले झूठे थे और कोई हिंसा नहीं हुई थी.”

इन महिलाओं में अधिकांश निचली सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि से थीं और मामूली साक्षर थीं. वे वकील या अपने परिवार के पुरुष सदस्य या धार्मिक नेता या सरपंच की सलाह पर चल रही थीं.

बलवंत सिंह कहते हैं, “उनका एकमात्र मकसद था कि घर पर हिंसा बंद हो. हालांकि 498ए के तहत सुलह समझौते के बावजूद अधिकांश मामलों में फिर से हिंसा शुरू हो गई.”

“इसलिए ये कहना ग़लत होगा कि इस धारा का दुरुपयोग हो रहा है. असल में न्यायिक तंत्र ठीक से महिलाओं की चिंताओं को संबोधित नहीं करता है.”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *