पंजाब: अमृतपाल सिंह और उनके समर्थकों ने क्यों घेरा अजनाला थाना ?

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DMT : पंजाब : (26 फ़रवरी 2023) : –

कुछ दिन पहले ‘वारिस पंजाब दे’ नामक संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह और उनके समर्थकों ने अपने सहयोगी तूफ़ान सिंह को रिहा कराने के लिए अमृतसर के अजनाला थाने को घेराव किया था.

अमृतपाल सिंह अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ थाने पहुंचे थे. इनमें कुछ के पास बंदूकें और तलवारें भी थीं. इसके अलावा वे अपने पांच साथियों के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतों को भी रद्द करने की बात कर रहे थे.

हालांकि पुलिस से बातचीत के बाद मामला सुलझ गया. लेकिन सबकी नज़रें अमृतपाल सिंह पर ज़रूर गईं.

कौन हैं अमृतपाल सिंह और वो कैसे सुर्खियों में आए, यह जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.

26 जनवरी 2021 को दिल्ली में कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान प्रदर्शनकारी पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ सेंट्रल दिल्ली में घुसे थे. इस दौरान कुछ लोगों ने लाल किले की प्राचीर पर सिख धर्म का प्रतीक माना जाने वाला खालसा झंडा फहराया था.

इन सबके लिए जिन लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया था उनमें पंजाबी कलाकार दीप सिद्धू का भी नाम था.

उसी साल सितंबर में यानी लगभग आठ महीने बाद सिद्धू ने ‘वारिस पंजाब दे’ नाम की एक संस्था बनाई. इसके लगभग पांच महीनों बाद दीप सिद्धू की एक कथित तौर पर कार दुर्घटना में मौत हो गई. इसे कई लोग साजिश क़रार देते हैं.

29 सितंबर 2022 को ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन सुर्खियों में तब आया, जब दुबई से लौटे एक नौजवान अमृतपाल सिंह ने इसके प्रमुख के रूप में पदभार संभाला.

इसके लिए ‘दस्तार बंदी’ समारोह पंजाब के मोगा जिले के रोडे गांव में आयोजित किया गया.

रोडे, जरनैल सिंह भिंडरावाले का पैतृक गांव है. इस समारोह को हजारों लोग पहुंचे और यहां पर कथित तौर पर ख़ालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए.

एक इंटरव्यू में अमृतपाल सिंह ने बताया था कि उनका जन्म और पालन-पोषण अमृतसर के जादूखेड़ा गांव में हुआ है. उनकी शादी 10 फरवरी 2023 को बाबा बकाला में हुई थी.

अमृतपाल सिंह के मुताबिक़ स्कूली शिक्षा के बाद वो रोज़गार की तलाश में वो दुबई चले गए. हालांकि यहां लौटने के कुछ ही महीनों के भीतर वे पंजाब की राजनीति का केंद्र बन गए.

अमृतपाल पंजाब की राजनीति का केंद्र

अमृतपाल की तुलना अक्सर 1984 के ऑपरेशन ब्लूस्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले से की जाती है. कुछ तो उन्हें भिंडरावाले 2.0 का भी नाम देते हैं.

ऐसा करने वाले मानते हैं कि अमृतपाल की कद काठी उन्हीं की तरह है, वो उन्हीं की तरह दिखते हैं और बात करते हैं. वो खुलकर ख़ालिस्तान की मांग करते हैं. हालांकि ऐसा करने वाले वो अकेले व्यक्ति हों ऐसा नहीं है.

अमृतपाल खुलकर सभी राजनीतिक पार्टियों का भी विरोध करते हैं और साथ ही नशे का भी, जो पंजाब में पिछले सालों में बहुत गंभीर मुद्दा रहा है.

लेकिन अभी तक सबसे ज्यादा सुर्खियां उन्होंने 23 फरवरी को किए गए अजनाला थाने के घेराव की घटना से बटोरी. इस दिन हथियारबंद समर्थकों के साथ उनकी कुछ तस्वीरों ने लोगों को हैरान भी किया और डराया भी.

पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, “यह बात बहुत आश्चर्यचकित करती है कि एक 29 साल का दुबई से आया हुआ व्यक्ति कैसे रातोंरात इतना प्रसिद्ध हो गया. भिंडरावाले तो एक धार्मिक नेता भी थे. हम जानते हैं कि एक राजनीतिक पार्टी ने उन्हें खड़ा किया था और आगे उन्होंने क्या किया और कब. लेकिन अमृतपाल की इस कदर लोकप्रियता रहस्यमयी नज़र आती है.”

फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या वजह है कि इतने लोग उनके साथ खड़े हो जाते हैं?

प्रोफेसर आशुतोष कहते हैं, “इसकी वजह है कि जब हिंदू राष्‍ट्र की बात होती है, तो सिखों को लगता है कि ख़ालिस्तान की भी बात होनी चाहिए. ऐसे में उन्हें एक लीडर की ज़रूरत महसूस होती है जो उन्हें अमृतपाल में नज़र आता है. फिर वे देखते हैं कि यह व्यक्ति सिखों के साथ हुई नाइंसाफ़ी और बाक़ी घटनाओं की बात करता है तो वे उसकी बात सुनते हैं.”

वहीं पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ख़ालिद मोहम्मद का मानना है, “इसके अलावा सोशल मीडिया की भी बहुत बड़ी भूमिका है जो आख़िरी व्यक्ति तक पहुंचता है. ऐसे में लोग उनके साथ और आसानी से जुड़ पाते हैं.”

क्या अमृतपाल को किसी ने प्लांट किया है?

लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि क्या अमृतपाल को किसी ने पंजाब में ‘प्लांट’ किया है. इस सवाल के पीछे उनकी इतनी जल्दी लोकप्रियता के शिखर पर होना तो है ही, साथ ही कई और कारण भी दिए जा रहे हैं.

आम लोग यह भी पूछते हैं कि क्या कारण है कि अमृतपाल लगातार भड़काऊ बयान देते हैं पर उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती. उनके समर्थक बंदूकें और अन्य हथियार लेकर आम घूमते हैं, जबकि किसी के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर हथियार के साथ पुरानी तस्वीर पर भी मुक़दमा दर्ज किया जाता है. तब यह कहा जाता है ऐसी कार्रवाई हथियारों की ‘ग्लोरिफ़िकेशन’ रोकने के लिए किया गया है.

जब अजनाला में थाने का घेराव हो रहा था उस वक्त पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान राज्य में निवेश को बढ़ावा देने के लिए मोहाली में ‘इन्वेस्ट पंजाब समिट’ में हिस्सा ले रहे थे.

अजनाला की घटना ने सारा ध्यान अमृतपाल और पंजाब की क़ानून-व्यवस्था पर सवाल करने वाली इस घटना पर मोड़ दिया. कुछ लोग पूछते हैं कि क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था?

पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ख़ालिद मोहम्मद कहते हैं, “ऐसा संभव है कि कुछ राजनीतिक पार्टियां आम आदमी पार्टी को बैकफ़ुट पर धकेलना चाहती हैं, जिसका फ़ायदा अमृतपाल को हो रहा है. हालांकि ऐसा नहीं लगता कि किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने उन्हें खड़ा किया है. क्योंकि सभी उनका विरोध करते नज़र आते हैं.”

‘प्लांट’ किए जाने का सवाल अमृतपाल से किया गया तो उन्होंने कहा कि, “लोग तो जरनैल सिंह भिंडरावाले को भी प्लांट कहते थे”

वो यह भी दलील देते हैं कि सभी पार्टियां उनकी आलोचना करती हैं, चाहे वो बीजेपी हो या कांग्रेस हो या फिर अकाली दल. वो भी सभी की आलोचना करते हैं. अगर वे प्लांट होते तो क्या ऐसा होता?

अमृतपाल सिंह कैसे और क्यों चाहते हैं ख़ालिस्तान?

अमृतपाल का मानना है कि उनकी खालिस्तान की मांग “बिल्कुल जायज़ है, क्योंकि सिख भारत में आज़ाद नहीं हैं.”

उनके कुछ बयान उनकी सोच को उजागर करते हैं. अपनी दस्तारबंदी के समय उन्होंने ये कहा कि, “यह वादा है आपसे कि हमारे शरीर में जो लहू है उसका एक-एक क़तरा आपके चरणों में बहेगा, पंथ की आज़ादी के लिए बहेगा.”

कुछ लोगों का ये भी आरोप है कि अमृतपाल यह भी कहकर सिखों की भावना को भड़काते हैं, “अगर कोई सिख अपने आप को आज़ाद समझता है, तो वो किसी डाक्टर के पास जाए और अपना इलाज कराए.”

वो मौत की भी बात करते हैं और कहते हैं, “हम मौत से नहीं डरते. मुझसे कहा जाता है कि माताओं के पुत्रों को मरवाऊंगा. मैं कहता हूँ कि जो गुरु के चरणों में मरेगा, वो लोगों का पुत्र नहीं रहेगा वो गुरु का पुत्र हो जाएगा.”

वैसे वो नशे के ख़िलाफ़ भी बहुत बात करते हैं और युवाओं को इसे छोड़ने की बात करते हैं.

क्या अजनाला की घटना अपने आप में इकलौती है?

एक भाषण में वो महिलाओं को फैशन के पीछे न भागने की सलाह देते सुनाई देते हैं, “बहनों और महिलाओं से अपील है. जो यह फैशन है, वो आता-जाता रहता है और वो बदलता रहता है. 10 साल पहले पटियाला सूट का फैशन था, वो अब बदल गया, लेकिन महाराज की वाणी 350 साल से चल रही है, वो नहीं बदली.”

पंजाब में पिछले सालों में ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जहाँ प्रदर्शनकारियों के इकट्ठा होने की जगह पर पुलिसकर्मी बेबस नज़र आए हैं.

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा था कि ‘धरना देने का तो चलन बनता जा रहा है. इससे लोगों को परेशानी भी हो रही है.’

पटियाला में पिछले साल 29 अप्रैल को हिंदू-सिखों की बीच हुई हिंसा भी पुलिस की बेबसी और नाकामी दर्शाती है. कुछ ही दिन पहले चंडीगढ़-मोहाली बार्डर पर पुलिस की बेबसी का एक और बड़ा नमूना देखने को मिला.

8 फरवरी को ‘क़ौमी इंसाफ मोर्चा’ पर आरोप लगा कि उसने चंडीगढ़ पुलिस पर कथित तौर पर पथराव किया और सरकारी गाड़ियां तोड़ने के अलावा सरकारी सामान भी लूटा. इस वारदात में चंडीगढ़ के 13 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे.

कई पुलिस वालों ने तो छिप कर और हाथ जोड़ कर अपनी जान बचाई. इस मामले में मोर्चा पर हत्या के इरादे से पुलिसवालों पर हमला करने का केस दर्ज किया गया है.

पुलिस ने यह भी कहा कि यह खालिस्तान की सोच रखने वाले लोगों और संगठनों ने किया है. लेकिन वारदात में शामिल किसी आरोपी को फ़िलहाल गिरफ्तार नहीं किया जा सका है.

चंडीगढ़ के डीएसपी प्रवीर रंजन ने इल्ज़ाम लगाया था कि पंजाब पुलिस ने प्रदर्शनकारी हमलावरों को रोकने तक का प्रयास नहीं किया. हालांकि यह कहा जा सकता है कि जिस तरीके से अजनाला पुलिस थाने पर कब्ज़ा किया गया उसकी मिसाल कम हैं.

पुलिस के एक पूर्व अधिकारी ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, “मैंने 1980 के दशक में पुलिस की नौकरी शुरू की थी. मैंने हर तरह के दिन देखे हैं. मिलिटेंसी का दौर भी देखा है. पुलिस थानों पर पहले भी हमले हुए हैं और पहले भी पुलिस को लोगों ने बैकफुट पर धकेला है. लेकिन पहली बार पुलिस को इतना बेबस देखा.”

अजनाला की घटना का क्या होगा नतीजा?

अजनाला की घटना पर पंजाब के डीजीपी गौरव यादव कहते हैं, “घटना के वीडियो खंगाले जा रहे हैं. जो पुलिस वाले इस घटना में घायल हुए हैं, उनके बयानो पर कार्रवाई की जाएगी.”

वहीं दूसरी ओर अमृतपाल ने कहा है, “इस चैप्टर को यहीं बंद कर देना चाहिए. लेकिन पुलिस ने फिर मामला दर्ज किया तो फिर प्रदर्शन होगा.”

जानकार कहते हैं कि इस घटना से अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे और आम लोगों में भय का माहौल होगा.

मोहाली के एक प्रॉपर्टी डीलर कहते हैं कि “पिछले दिनों में हालात ख़राब हो रहे हैं और निवेशक यहाँ से बाहर जा रहे हैं. इस घटना से इस पर और भी बुरा असर हो सकता है.”

पंजाब की क़ानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं और साथ ही सरकार और प्रशासन की कार्यशाली पर भी.

ऐसे में पंजाब और बाहर के लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि क्या यह राज्य रहने और काम करने के लिए सुरक्षित रह गया है? और ये भी कि, कहीं पंजाब में 1980 के ख़तरनाक दौर की वापसी तो नहीं होने जा रही.

वैसे यह आने वाले दिनों में पंजाब और केंद्र की सरकार के उठाए क़दमों पर निर्भर होगा.

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