बिहार: ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ की धीमी आँच पर पक रही है राजनीति

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DMT : पटना  : (14 जून 2021) : – पश्चिम बंगाल में बीजेपी के चुनाव हारने के बाद से ही पड़ोसी राज्य बिहार की राजनीति में उथल पुथल मची हुई है. सत्ता पक्ष के चारों दल (हम, वीआईपी, जेडीयू और बीजेपी) अपना-अपना सुर अलाप रहे हैं.

तो वहीं दूसरी ओर ‘तकनीकी’ तौर पर विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ने वाली लोक जनशक्ति पार्टी में टूट की ख़बरें 13 जून की रात से ही मीडिया में तैरने लगी. लोजपा सांसद पशुपति कुमार पारस ने बाद में इसकी पुष्टि भी कर दी है.

पशुपति पारस ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “हमारी पार्टी में छह सांसद हैं. पाँच सांसदों की इच्छा थी की पार्टी का अस्तित्व ख़त्म हो रहा है इसलिए पार्टी को बचाया जाए. मैंने पार्टी तोड़ा नहीं है, पार्टी को बचाया है. चिराग़ पासवान से कोई शिकायत नहीं है. कोई आपत्ति नहीं है, वे पार्टी में रहें.”

लोजपा सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को पत्र लिखकर माँग की है कि अब पशुपति कुमार पारस को संसदीय दल का नेता माना जाए. इस वक़्त दिवंगत नेता रामविलास पासवान के बेटे चिराग़ पासवान लोजपा संसदीय दल के नेता हैं.

जानकार मानते हैं कि बिहार में ये ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का दौर है, जिसमें सत्ता पक्ष का हर दल अधिक से अधिक ‘बारगेन’ करना चाहता है.

विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री मुकेश सहनी ने बीबीसी हिंदी से कहा, “बिहार में अभी जो कुछ हो रहा है वो कुछ हद तक प्रेशर पॉलीटिक्स है. क्योंकि सभी पार्टियों को अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों या अपने वोटरों के लिए आवाज़ उठानी है.”

मांझी की तल्ख़ी

दरअसल, नीतीश सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और इसका सबसे बड़ा संकेत पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का बयान है.

उन्होंने एनडीए के घटक दलों से “एक दूसरे के विरुद्ध सार्वजनिक तौर पर बयानबाज़ी करने के बजाय संगठन के आंतरिक मंच पर अपनी बात रखने को कहा है और साथ ही ग़ैर-ज़िम्मेदार बयानबाज़ी करने के बजाय पीड़ित मानवता की रक्षा करने में अपनी ऊर्जा लगाने” की अपील की है.

इस वक़्त पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी सबसे ज़्यादा आक्रामक दिख रहे हैं.

वह पहले भी कोविड टीकाकरण सर्टिफ़िकेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर को लेकर सवाल उठा चुके हैं.

बीते 23 मई को उन्होंने ट्वीट किया था कि सर्टिफ़िकेट पर “देश में संवैधानिक संस्थाओं के सर्वेसर्वा होने के नाते राष्ट्रपति की तस्वीर होनी चाहिए.”

उन्होंने लिखा था, “ग़रीब दलित जब आगे बढ़े तो नक्सली, ग़रीब मुसलमान जब मदरसे में पढ़े तो आतंकी, भाई साहब ऐसी मानसिकता से बाहर निकलिए.”

जीतन राम मांझी के इस ट्वीट से पहले बीजेपी विधायक हरिभूषण सिंह ने एक बयान में कहा था कि मदरसे में सिर्फ़ धर्म और आतंकवाद की शिक्षा दी जाती है.

हम प्रवक्ता दानिश रिज़वान कहते हैं, “किसी भी पार्टी की अकेले की सरकार नहीं है. हम सब एक मंच पर हैं वो भी बिहार के विकास के मुद्दे के लिए. ना की किसी तरह की धार्मिक राजनीति या धार्मिक एजेंडे को लेकर. ऐसे में आप किसी भी धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे तो ‘हम’ ज़रूर बोलेगा.”

तेज प्रताप-मांझी की मुलाक़ात

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ जीतन राम मांझी के तल्ख़ बयानों के कारण ही बिहार की राजनीति में घमासान मचा हुआ है. बल्कि इसके पीछे एक प्रमुख कारण जीतन राम मांझी और लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की मुलाक़ात भी है.

दोनों नेताओं के बीच राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर मुलाक़ात हुई. इस मुलाक़ात से पहले ही तेज प्रताप बयान दे चुके थे कि ‘जिसका मन डोल रहा है वो हमारे साथ आ जाएँ.’

इस बयान का संदर्भ पूछने पर राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं, “तेजप्रताप और मांझी के मिलने को तो समझने वाले समझ गए जो ना समझे वो अनाड़ी हैं. अबकी बरसात में ही सरकार की नइया डूबेगी और स्वाभाविक जनादेश वाली पार्टी सरकार बनाएगी.”

वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल कहते हैं, “तेज प्रताप अपने नेता तेजस्वी यादव से दुखी हैं. तेजस्वी यादव हर संकट के समय बिहार से ग़ायब हो जाते हैं, इसलिए दुखी होकर जीतन राम मांझी से मिलने गए थे.”

दैनिक जागरण, बिहार के राज्य ब्यूरो प्रमुख अरविंद शर्मा इस मुलाक़ात को महत्वपूर्ण नहीं मानते.

वो कहते हैं, “तेज प्रताप और मांझी की मुलाक़ात को बेवजह उछाला जा रहा है. क्या लालू जी को मांझी जी से बात करने की लिए किसी मीडिएटर की आवश्यकता है? अगर मान लें कि है भी, तो क्या तेजप्रताप यादव को भेजा जाएगा, जिनकी छवि गंभीर नेता की नहीं है.”

सरकार के कामकाज को लेकर अंदरुनी नाराज़गी

सरकार के कामकाज ख़ास तौर पर विधायक और पार्षद फ़ंड को लेकर नाराज़गी भी है. वीआईपी के मुकेश सहनी इसे लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भी लिख चुके हैं.

मुकेश सहनी कहते हैं, “सरकार को अब वैक्सीनेशन पर कोई ख़र्च नहीं करना पड़ेगा क्योकि प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राज्यों को मुफ़्त वैक्सीन उपलब्ध करवाने का एलान कर दिया है. राज्य सरकार ने इससे पहले विधायकों/ पार्षदों से वैक्सीनेशन के लिए फ़ंड लिया था जो अब वापस कर देना चाहिए. ताकि हम लोग अपने इलाक़े में विकास कार्य कर सकें.”

वैसे पत्र लिखने वालों में अकेले मुकेश सहनी नही हैं.

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी इस मसले पर मुख्यमंत्री को तीन चिठ्ठी लिख चुके हैं.

उन्होने विधायक/विधानपार्षद फ़ंड में हो रहे कथित भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए इसे विधायकों व विधानपार्षदों को वापस करने का आग्रह किया है.

इस बीच राजद सुप्रीमो लालू यादव के साथ मुकेश सहनी की बातचीत की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में है जिसे ख़ारिज करते हुए मुकेश सहनी ने बीबीसी से कहा, “लालू जी से मेरी कोई बातचीत नहीं हुई है.”

बिहार सरकार के घटक दलों में उठापटक की एक वजह किसी समन्वय समिति का ना होना भी है.

नीतीश कुमार पर सवाल

ख़ुद बीजेपी और जेडीयू के बीच की तल्ख़ी भी तब बढ़ गई थी, जब बीजेपी के एमएलसी टुन्ना पांडेय ने ‘नीतीश कुमार को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री’ कह दिया था.

जिस पर जेडीयू ने ऐतराज़ जताया था और बाद में कार्रवाई करते हुए बीजेपी ने टुन्ना पांडेय को पार्टी से निलंबित कर दिया था.

जेडीयू प्रवक्ता अंजुम आरा कहती हैं, “ये बीजेपी का कोई आधिकारिक बयान नहीं था. फिर उन्होंने एमएलसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की. बिहार में एनडीए का गठबंधन अपना कार्यकाल पूरा करेगा.”

सिवान से आने वाले और शराब के कारोबार से जुड़े रहे टुन्ना पांडेय वही बयान दोहरा रहे हैं जो कभी राजद के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार के लिए दिया था.

शहाबुद्दीन भी नीतीश कुमार को परिस्थितियों का सीएम कहते थे.

टुन्ना पांडेय ने बीबीसी से कहा, “जब तक शहाबुद्दीन परिवार का कोई भी व्यक्ति सदन में किसी भी दल से नहीं जाता है, तब तक मैं भी राजनीति नहीं करूँगा.”

दरअसल, मोहम्मद शहाबुद्दीन की मौत के बाद से ही सिवान की राजनीति गर्म है.

मंत्रिमंडल में जेडीयू

साल 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने को तैयार बैठी जेडीयू ‘सम्मानजनक भागीदारी’ नहीं मिलने से नाराज़ होकर मंत्रीमंडल में शामिल नहीं हुई थी. लेकिन अब राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने कहा है कि जेडीयू को मंत्रिमंडल में सम्मानजनक भागीदारी मिलनी चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत चंदन कहते हैं, “बंगाल चुनाव की हार के बाद बीजेपी दबाव में है. पार्टी इस हार के बाद दूसरा झटका नहीं झेलना चाहेगी.”

हालांकि अब ये देखना होगा कि लोजपा में टूट के बाद मंत्रिमंडल की तस्वीर क्या आकार लेती है. क्योंकि पहले ये अनुमान लगाया जा रहा था कि चिराग पासवान को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर जेडीयू एतराज़ करेगा. लेकिन अब लोजपा का नेतृत्व पशुपति कुमार पारस के हाथ में है.

साल 2020 की बिहार विधानसभा का अंकगणित, साल 2015 की विधानसभा की तरह बहुत सुलझा हुआ नहीं है.

चुनाव में जेडीयू को 43, बीजेपी को 74, हम को चार, वीआईपी को चार सीट मिली थी वहीं दूसरी तरफ़ महागठबंधन में राजद को 75, कांग्रेस को 19 और वाम दलों को 16 सीट मिली थी.

एआईएमआईएम को पाँच और लोजपा, बसपा ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की थी. बाद में लोजपा और बसपा के विधायक जेडीयू में ही शामिल हो गए थे.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा बिहार में चल रही इस उठापटक पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “नीतीश कुमार का अपर हैंड इस वक़्त है. आम दिनों में भी जब वो प्रेशर में दिखते हैं तब भी वो दरअसल दबाव में नहीं रहते बल्कि मौक़ा मिलने पर अपने स्टाइल की राजनीति और कामकाज दोनों ही करते हैं. मुझे लगता है कि बिहार में ये उथल पुथल चलती रहेगी लेकिन सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी.”

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