भूकंप में भी न गिरने वाली इमारतें बनाना क्या संभव है?

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DMT : तुर्की  : (12 फ़रवरी 2023) : –

तुर्की के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र ग़ाज़ीअनटेप में सोमवार यानी 6 फ़रवरी 2023 की सुबह अचानक धरती हिली और यहां की इमारतें जैसे झूलने लगीं. जब भूकंप का झटका रुका तब तक तमाम इमारतें मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी थी.

इसके बाद बचा कर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मलबे में फंसी ज़िंदगियों को बचाने की थी.

तुर्की और सीरिया में 7.8 तीव्रता से इस भूकंप के कारण अब तक 28 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है जबकि हज़ारों घायल हैं

नुक़सान से सबक

भूकंप की वजह से होने वाली मौतें और नुक़सान कुदरत का ऐसा प्रकोप है जिसे रोक पाना मुश्किल है.

दुनिया में अलग-अलग तरह की इमारतें हैं. उनका गिरना कई बातों पर निर्भर करता है. इनसे जुड़ी बारीकियों पर बात करते हुए वो कहती हैं कि इमारतें टिकाऊ क्यों नहीं रहीं, ये समझना ज़रूरी है ताकि भविष्य में उन्हें ज़्यादा मजबूत बनाया जा सके.

वो कहती हैं, “दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया, इंडोनेशिया और जापान में भूकंप आने की ज़्यादा आशंका होती है. हिमालय, नेपाल, हैती और तेहरान में भी भूकंप की आशंका रहती है. तेहरान में 90 लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं. इस्तांबुल भी ख़तरे की जद में है.”

वो बताती हैं, “मैं एक सिविल इंजीनियर हूं. मैं समाचार देख रही थी. 2005 में पाकिस्तान में 86 हज़ार लोग मारे गए थे. इनमें से ज़्यादातर की मौत इमारतें गिरने से हुई थी. मैं अब जो काम कर रही हूं, उसके पीछे प्रेरणा यही है कि किस तरह इमारतों का गिरना रोककर लोगों की जान बचाई जाए.”

2005 में पाकिस्तान के भूकंप के दो महीने बाद वो टूटी, बिखरी इमारतों और मलबे के बीच पाकिस्तान में थीं.डॉक्टर एमिली पहली बार ऐसे दृश्य देख रहीं थीं. वो बताती हैं कि वो तस्वीरें बहुत ही भयावह थी. पाकिस्तान के बाद उन्होंने इंडोनेशिया, पेरू, चीन, इटली, जापान और समोआ में भूकंप के प्रभाव का अध्ययन किया. जो आंकड़े उन्होंने जुटाए उनके मुताबिक इन देशों में भूकंप में दो लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.

इस दौरान उन्होंने विकासशील देशों में एक ऐसे ट्रेंड को देखा जो परेशानी की वजह बन रहा है.

डॉ एमिली कहती हैं, “लोग आधुनिक निर्माण सामग्री का इस्तेमाल करना चाहते हैं. मसलन कंक्रीट लेकिन उनके पास सही तरीके से निर्माण करने का हुनर या फिर पैसे नहीं है. उनके पास कंक्रीट तो है लेकिन इंजीनियरिंग की जानकारी नहीं है. ऐसे में भूकंप के दौरान ये इमारतें गिरती हैं और लोग दब जाते हैं.”

ये इमारतें एक तरह से सुरक्षा का अहसास कराती हैं लेकिन सुरक्षित होती नहीं हैं. डॉक्टर एमिली के मुताबिक़ इमारत की डिजाइन काफ़ी मायने रखती है.

एमिली की माने तो जो इमारतें ठीक तरह से नहीं बनी होती हैं, वहां ज़्यादा मौतें होती हैं.

वो कहती हैं, “रिहाइशी इमारतों की गुणवत्ता को लेकर एक बात अहम है कि वो विकसित देश में बनी हैं या फिर विकासशील देश में. उदाहरण के लिए 1999 में ताइवान के चीची में आए 7.6 तीव्रता के भूकंप में दो हज़ार से कुछ ज़्यादा लोगों की मौत हुई जबकि 2005 में पाकिस्तान में इसी तीव्रता के भूकंप में 86 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.”

डॉक्टर एमिली चेतावनी देते हुए कहती हैं कि भूकंप के दौरान मौत का ख़तरा बढ़ रहा है. अब शहरों की आबादी बढ़ने लगी है. ऐसे में सुरक्षित इमारतें तैयार करना बहुत ज़रूरी हो गया है.

ऊंची इमारतें

आर्किटेक्ट डेविड मैलॉट कहते हैं कि ऊंची इमारतें अपनी ऊंचाई की वजह से भूकंप के दौरान ज़्यादा टिकाऊ होती हैं.

दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में से कुछ डेविड ने बनाईं हैं. वो कहते हैं कि कम या मध्यम ऊंचाई की इमारतें ज़मीन हिलने को लेकर ज़्यादा संवेदनशील होती हैं. जबकि सौ मंज़िला इमारत भूकंप की आवृत्ति से बाहर होती है.

डेविड जापान में पैदा हुए हैं और बताते हैं कि भूकंप जापान की रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा है.

लेकिन 11 मार्च 2011 को जापान में सबसे ज़्यादा लंबे समय तक भूकंप का झटका महसूस हुआ. इसके असर से सूनामी की लहरें उठीं. इसने एक न्यूक्लियर पावर प्लांट को तबाह कर दिया और 18 हज़ार लोगों की जान ले ली.

डेविड ने अब जापान के लिए नया सपना देखा है. इस बारे में वो कहते हैं, “मैं एक मील ऊंची इमारत बनाना चाहता हूं. करीब 1.6 किलोमीटर ऊंची टॉवर. ये अभी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत से लगभग दोगुनी ऊंची होगी. इसमें क़रीब ढाई सौ फ्लोर होंगे.”

वो बताते हैं कि उस इमारत में एक वक़्त में करीब 50 हज़ार लोग रह रहे होंगे. एक तरह से ये आकाश में बसा शहर होगा.

हालांकि डेविड कहते हैं कि ये इमारत सुरक्षित होगी. वो कहते हैं, “मैं 15 साल से ऊंची इमारतों पर काम कर रहा हूं. मैंने सबसे पहले जो इमारत पूरी की, वो है शंघाई वर्ल्ड फाइनेंशियल सेंटर. इसकी ऊंचाई 492 मीटर है. साल 2008 में सिचुआन में आए भूकंप ने शंघाई को भी हिला दिया. तब भी इस इमारत पर असर नहीं हुआ. भूकंप के दौरान इस टॉवर का ऊपरी हिस्सा एक मीटर के करीब हिला.”

वैसे तो ये काफी ज़्यादा लगता है. लेकिन डेविड कहते हैं कि जब आप ये देखते हैं कि इमारत पांच सौ मीटर ऊंची है तो ये बहुत कम है.

आधुनिक दौर की कुछ गगनचुंबी इमारतों में कम ऊंचाई वाली इमारतों के मुक़ाबले कई खूबियां हैं. पहली ये कि भूकंप के झटकों के दौरान कम ऊंची इमारतें मलबा बन सकती हैं, वहीं ये टिकी रहती हैं.

दूसरी बात ये है कि ये सबसे उन्नत डिजाइन और सामग्री से तैयार होती हैं. इसके लिए काफी पैसों की ज़रूरत होती है और कोई भी ये नहीं चाहेगा कि ये मलबे में तब्दील हो जाए.

डेविड कहते हैं, “इन इमारतों को सौ या दो सौ साल तक टिके रहने के लिए डिजाइन किया जाता है. ढांचे की डिजायन तैयार करने और टेस्ट करने के लिए आप जो निवेश करते हैं वो बाल्टी भर पानी में बूंद के समान है.”

डेविड बताते हैं कि बेहतर डिजाइन और कड़े परीक्षण से तैयार ऊंची इमारतों को बहुत हद तक भूकंपरोधी बनाया जा सकता है.

प्रयोग और नतीजे

आर्किटेक्ट मार्टिन शिल्डकैंप कहते हैं, “हम जापान की सारी गगनचुंबी इमारतों की गिनती कर सकते हैं लेकिन भारत में भवनों की गिनती करना मुश्किल है. इस तरह की सूचनाएं मौजूद नहीं है कि जो भवन सही तकनीक से नहीं बने हैं, भूकंप के दौरान उनकी कैसी स्थिति होगी.”

मार्टिन की चैरिटी स्मार्ट शेल्टर सस्ते घर तैयार करते हैं. मार्टिन कहते हैं कि अगर आपके पास बहुत सारा पैसा है तो आप एक शहर को भूकंपरोधी बना सकते हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए इस तरह के ताक़तवर लोगों का समूह नहीं है जो इसमें पैसे लगाएं क्योंकि इसमें किया गया निवेश कभी वापस नहीं होगा.

मार्टिन बताते हैं कि उन्होंने नेपाल में भूकंपरोधी तरीके इस्तेमाल करते हुए स्कूल बनाए लेकिन क्या भूकंप के दौरान इनका परीक्षण हुआ है?

वो कहते हैं, “नेपाल में 2015 में आए भूकंप के दौरान हमारी इमारतों में एक दरार तक नहीं आई. ये इमारतें भूकंप के केंद्र से क़रीब 70 किलोमीटर दूर हैं. जिसे ज़्यादा फासला नहीं कहा जा सकता.”

“सच ये भी है कि ये जिस इलाक़े में हैं, वहां काठमांडू घाटी जैसी तबाही नहीं हुई. लेकिन मैं ये भी कह सकता हूं कि अगर हमारे स्कूल काठमांडू इलाक़े में होते तो भी टिके रहते. लेकिन ये सही है कि उनका परीक्षण हो चुका है.”

मार्टिन एक रहस्य को भी सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. वो कहते हैं कि भूकंप प्रभावित इलाक़े में कई बार देखने को मिलता है कि एक मकान पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और पड़ोस में बना वैसा ही मकान मज़बूती से खड़ा है.

इसकी वजह क्या है, ये समझने के लिए उन्होंने एक रिसर्च नेटवर्क तैयार किया. वो जानना चाहते थे कि आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री को कैसे बेहतर किया जाए.

वो कहते हैं, “उदाहरण के लिए पत्थर, लकड़ी और ईंटें. हम पूरी दुनिया में इन्हें देखते हैं. हम मूल रूप से इन्हें लें और स्थानीय स्तर पर इनमें थोड़ा बदलाव कर लें तो मुझे लगता है कि लंबी दूरी तय कर सकते हैं.”

वो नेपाल का उदाहरण देते हैं, जहां इमारत में पीपे के इस्तेमाल के फ़ायदे दिखते हैं. ये स्टील के तारों को गूंथकर बनाया जाता है. इसमें पत्थर भरे होते हैं. पहाड़ के किनारे इन्हें लगाने के बजाए दीवार में लगाया जाता है. ऐसा करने पर सीमेंट की ज़रूरत नहीं होती. लेकिन कुछ ऐसे प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें वो ख़ारिज करते हैं.

मार्टिन कहते हैं कि शिल्डकैंप मैं नेपाल में कई तरह के प्रयोग देख रहा हूं. वहां लोग रेत के बोरों, घास फूस के ढेर और प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल निर्माण के लिए कर रहे हैं.

वो कहते हैं, “इससे निर्माण में तेज़ी आती है और ये सस्ता भी है. मैं पूरी तरह इसके ख़िलाफ़ हूं. जो लोग एक बार अपने घर गंवा चुके हैं उनके आंगन में ऐसे प्रयोगों के मैं सख्त ख़िलाफ़ हूं. ऐसा यूनिवर्सिटी के सुरक्षित माहौल में होना चाहिए. पहले हमें ये जानकारी करनी चाहिए कि ये कैसे काम करेगा, उसके बाद हमें नेपाल के गांवों में इस तरह से हज़ारों घर बनाने के बारे में सोचना चाहिए.”

मार्टिन कहते हैं कि ग़रीब देश बेहतर स्थिति हासिल कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें सही कदम उठाने होंगे.

तैयारी के फ़ायदे

भूकंप से होने वाले तमाम नुक़सान को रोकने की प्रक्रिया बहुत महंगी है. लेकिन नुक़सान को सीमित करना बहुत हद तक संभव है. बशर्ते इसके लिए समय और प्रयास की ज़रुरत है

भूकंप विज्ञानी डॉक्टर लूसी जोन्स की राय है कि कुछ ही लोग ये फिक्र करते हैं कि भूकंप का एक ज़बरदस्त झटका बड़ी तबाही की वजह बन सकता है.

उन्होंने साल 2008 में संभावित ख़तरे को लेकर लोगों की राय बदलने के लिए एक बड़ी कोशिश की थी. लूसी कहती हैं कि उन्होंने जिस स्थिति की कल्पना की थी, उसमें अगर झटका करीब 50 सेकेंड का हो तो दक्षिणी कैलिफोर्निया का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा.

वो बताती हैं, “इस इलाक़े में कैलिफ़ोर्निया की लाइफ़लाइन मसलन फ्रीवेज़, रेलवे और प्राकृतिक गैस हैं. लॉस एंजलिस की रिफ़ाइनरी से पेट्रोलियम पदार्थ नवादा और एरिज़ोना जाते हैं. बिजली और पानी की लाइनें भी जाती हैं.”

वो कहती हैं, “जिस समय गैस लाइन ब्रेक होती है, उसी समय पेट्रोलियम की पाइपलाइन भी फट जाती है. जगह भी लगभग वही होती है. आपने उन्हें एक ही जगह बनाया है. इससे रेलवे और यातायात के दूसरे साधन भी बंद हो जाते हैं. पास में इलेक्ट्रिक लाइन होने की वजह से वहां आग भी लग जाती है.”

“ये आग शायद एक हफ़्ते तक सुलगती रहेगी. क्योंकि उस वक़्त के दूसरे हिस्सों में भी आग लगी होगी और तमाम दमकलकर्मी शहर में लगी आग बुझाने में व्यस्त होंगे.”

डॉक्टर लूसी ने जो संभावित तस्वीर पेश की, उसने कई लोगों को हिला दिया. इनमें सरकार के लोग भी शामिल थे. लॉस एंजलिस के मेयर ने लूसी को साथ जोड़ा. मेयर ने सभी पुरानी इमारतों की मरम्मत को अनिवार्य कर दिया.

डॉक्टर लूसी कहती हैं, “1950 और 1960 के दशक में निर्माण का जो तरीका प्रचलित था, उस तरह बनी करीब 15 सौ इमारतें लॉस एंजलिस में थीं. इस क्षेत्र में ऐसी हज़ारों और इमारतें थीं.”

“अगर भूकंप के तेज़ झटके आए तो इनमें से 10 से 20 प्रतिशत इमारतें गिर सकती थीं. उनमें काफी कंक्रीट इस्तेमाल हुआ था तो बड़े पैमाने पर लोग हताहत भी हो सकते थे.उन्हें हमने दुरुस्त करने का इरादा किया. इसमें काफी पैसे लगने थे. इसमें हमने कारोबारी जगत से मदद करने की बात की. “

डॉक्टर लूसी ने द्वारा भूकंप की जो संभावित तस्वीर सामने रखी गई उसके बाद इंजीनियरों ने पानी की लाइन को दुरुस्त करने पर ध्यान दिया. उन्होंने आग बुझाने के लिए समुद्र के पानी के इस्तेमाल के बारे में भी सोचा. आज लाखों और लोग भूकंप से जुड़ी ड्रिल में हिस्सा लेते हैं.

डॉक्टर लूसी इसे सकारात्मक दिशा में एक कदम मानती हैं. वो कहती हैं, “अगर हम देर तक भूकंप के झटके को झेलने की स्थिति हासिल कर सके तो हम स्थिति बदल सकते हैं. मुझे ये नहीं लगता कि हम दक्षिणी कैलिफोर्निया को भूकंपरोधी बना सकते हैं लेकिन हम ऐसी स्थिति हासिल कर सकते हैं जहां शहर में जनजीवन न रुके.”

यानी हम शहरों को भूकंपरोधी नहीं बना सकते क्योंकि ऐसा करना बहुत महंगा होगा. लेकिन अगर सोच समझकर पैसे खर्च किए जाएं तो ख़तरे को काफी हद तक घटाया जा सकता है.

दिक्कत ये है कि विकासशील देशों में जहां ख़तरा सबसे ज़्यादा मालूम होता है, वहां इसके बारे में बहुत कम जागरुकता है.

भूकंप के संभावित ख़तरे वाले इलाक़ों में असुरक्षित इमारतों में लोगों की बढ़ती संख्या के साथ ये ख़तरा भी बढ़ रहा है.

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